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दिन आखिर ढलता ही नहीं है

दिन ढलता ही नहीं है
जम गया है सीने में
रक्त थक्के की तरह
सुबह की आंच में उबलता ही नहीं है
चिमनी के कोयले में जलता ही नहीं है 
दिन आखिर ढलता ही नहीं है | गर ये बन गया है पाप की ईमारत
प्रायश्चित की लेप कहाँ से लाऊँ ?
गर ये बन गया है प्रतिद्रोह की ज्वाला
शांति का मेघ कहाँ से लाऊँ ?
उठ बैठता गर ये होता स्वप्न
अटल सत्य कैसे झूठलाऊँ ?
मैं स्वयं जल रहा हूँ
रुधिर के ताप में
मैं स्वयं हूँ शोषित
स्वयं के आलाप में
किसको बतलाऊँ, किसको समझाऊँ ?
दिन आखिर ढलता ही नहीं है
रात्रि के आँगन में कैसे जाऊँ ?
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अब यूँ ही मुझे ले चल ए जिंदगी |

अब यूँ ही मुझे ले चल ए जिंदगी  |
ख्वाबों में कहीं खे चल ए  जिंदगी ||

मेरे हसीन लम्हों को एक कमरा किराये दे
इससे पहले की हो जाएँ ओझल ए जिंदगी ||

ख्याल आया कितनी खूब है चिता सी मौत
जो चिंता में घुटने लगी पल पल ए जिंदगी ||

डूब रही है कहीं सूरज की आखिरी किरण
हो सके तो इस पहर से निकल ए जिंदगी ||

दीवार

हमारे तुम्हारे बीच
कोई दीवार बनी नहीं थी |
खिड़कियां थी, शीशे की
खुलती बंद होती लापरवाह दोस्त की तरह |

फिर एक दिन अचानक
डूबती शाम के इस पार
खड़े थे हम
और उस पार तुम -
दीवार बना दी हमने |

दीवार खड़ी हो गयी,
लेकिन हम जीते रहे उसी दौर में
जब कोई दीवार थी ही नहीं -
फिर रोज़ रोज़ की बहस में
दीवार बिखड़ कर गिर गयी |

दीवार बिखड़ कर गिर गयी
लेकिन हम जीते रहे उस दौर में
जब एक दीवार खड़ी थी
हमारे तुम्हारे दरमियान |
फिर रोज़ रोज़ की ख़ामोशी
रोज़ रोज़ के सन्नाटे
रोज़ रोज़ की बहस की आग में तप रही
जमीं की मिट्टी
सुर्ख लाल हो गयी है -
ईंटें तैयार हैं
नयी दीवार उठाने को |

बनते बिगड़ते दीवारों सी
रह गयी है जिंदगी |
काश बस खिड़कियां होती, शीशे की
खुलती बंद होती लापरवाह दोस्त की तरह |

कविता का आखिरी पूर्ण विराम

किसी का पिता होना
एक  जिम्मेदारी का होना है |  किसी का पुत्र होना  एक आबरू का होना है |  किसी का आशिक होना  मुहब्बत के ख़ुशनुमा लम्हों का होना है |  लेकिन किसी का चेतना हो जाना  उसके अस्तित्व का होना है | 
तुम मेरी चेतना हो  ये भी एक रिश्ता है |  समाजशास्त्रियों के टाइपराइटर में अंकित हुआ नहीं  लेकिन है, सत्य है, शाश्वत है  उतना ही शाश्वत  जितना  की जीवन, प्रकृति और बसंत | 
तुम मेरी चेतना हो  तुम्हारे छावं तले  चलता है  मेरा लफ्ज़ - मेरा सच और झूठ |  तुम्हारी स्याही से लिखी जाती है  निरीह उदास दौर में धुप्प अँधेरे जैसा नज़्म  ख़ुशनुमा हंसी के लम्हों में सवेरे जैसी कविता | 
तुम मेरी चेतना हो  और इसीलिए  तुम्हारे सामने  मेरी मुस्कराहट - मुस्कराहट है  मेरा रुदन -रुदन है  मेरा होना - काया  से परे  एक बेमांस  सत्य का होना है | 
तुम मेरी चेतना हो  और इसीलिए  तुम हो मेरे सीने में जलती आग  तुम हो मेरे आँखों की तरलता  तुम हो मेरे चेहरे का लावण्य  और मेरे गेसू का रंग भी | 
और ये है मेरी कविता का  आखिरी पूर्ण विराम  जहाँ पे आके थम जाएंगे  समाजशास्त्रियों के टाइपराइटर से जन्मे सारे रिश्ते,  लेकिन तु…

मौत कोई कविता नहीं है |

पिछले एक महीने में आई आई टी  खड़गपुर से दो छात्रों के सुसाइड की खबर, खबर से कहीं  ज्यादा उस एक सत्य की तलाश भी है जिसे हम आपने अर्सों से झुठला रखा है | लेकिन हर बार घूम फिर के सारा दोष संस्थान पे फेक देना भी उतना ठीक नहीं है | कभी कभी ये भी जरुरी है की हम अपना आत्मविश्लेषण करें - आखिर क्या कमी रह गयी जो हम एक लम्हे भर के आक्रोश को रोक नहीं पाए | एक छात्र का निर्माण घर से शुरू होता है, कॉलोनी वाले , आस पड़ोस वाले उसके इंस्पिरेशन बनते हैं और कहीं न कहीं सफलता की परिभाषा भी उसी दौड़ में गढ़ी जाती है | स्कूल आपका स्तम्भ है, कॉलेज उसपे पताका बांधता है | ऐसे में हर बात पे आई आई टी को सारा दोष देना भी तो ठीक नहीं | एक छात्र की हार में जितना जिम्मेदार कॉलेज है उतना ही उसका पिता भी, उसका परिवार भी, उसका समाज भी, उसका स्कूल भी | क्योंकि इनसब ने मिलकर तय किया था सफल होना , बुलंदियों को छूना, और जीतना का एक फ़र्ज़ी डेफिनिशन |

मौत कोई कविता नहीं है | 

वो इस सदी का सबसे बेवक़ूफ़ शायर है
जिसने कह रखा है
"मौत तू एक कविता है |"
मौत कोई कविता नहीं है
कविता है - मौत के खिलाफ विद्रोह |
वो शायर मेरा हर …

शूल

जब तुम मेरे पास होते हो
तुम मेरे पास नहीं होते |
तुम मेरे पास तभी होते हो
जब तुम मेरे पास नहीं होते |
तुम्हारा होना,
मेरे इस सफ़ेद दीवार से चेहरे पे
बस एक मुस्कराहट का होना है |
लेकिन तुम्हारा ना होना
एक शूल की तरह चुभता है
मेरे सीने जेहन में
लम्हा लम्हा घड़ी घड़ी |

मैं बन गया हूँ
एक उदासीन निर्मम जमीं
जो एहसास करता है
अपने बदन के खुश्बू की रौनक
तुम्हारे आसमान के आंसू में भींग कर |
कहीं ऐसा तो नहीं ?

खोज

जब भी कोई लड़की
हाथ में कार्डबोर्ड लिए
उतरती है सड़क पे
और हो जाती है किसी कैमरे में कैद,
ठीक उसी वक़्त
निकल पड़ते हैं सड़कों पे
अलग अलग ठीकेदारों के अलग अलग नुमाइंदे |
इस खोज में की
कहीं उसका कोई इतिहास तो नहीं
कहीं यूट्यूब पे कोई डांस तो नहीं
कहीं पुराना कोई रोमांस तो नहीं
कहीं उसका आर एस एस में होने का कोई चांस तो नहीं |

इस खोज में की देखो
उसके पुराने गैलरी में
किसी ने भगवा दुपट्टा बाँध रखा है क्या ?
वो सफ़ेद टोपी वाला उसका सखा है क्या ?

इस खोज में की
उसने गोधरा पे कुछ कहा था क्या ?
उसने चौरासी पे कुछ लिखा था क्या ?
इससे पहले कभी उसका चेहरा
यूँ ही कभी बिक था क्या ?

इस खोज में की
कोई फोटोशॉप की गुंजाईश तो नहीं
किसी पुराने कैमरे में कैद इसकी कोई फरमाइश तो नहीं,
पहले कभी इसने कोई "आजादी" वाले गाने गाये क्या ?
वो कार में डांस करने वाली का यूट्यूब लिंक
इसके नाम पे बेचा जाए क्या ?


और इसी खोज के इर्द गिर्द
एक तैयार लाश से
लोथड़े खींच रहे हैं
हम, आप, मीडिया और बाजार
और इसी खोज से
बन रही है
बिगड़ रही है
हमारी आपकी सरकार |


अगर कविता समझ में ना आये तो ये वाला यूट्यूब विडियो  https://www.you…