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Showing posts from April, 2013

कभी यूँ भी तो हो ||*

कभी  यूँ भी  तो हो 
की आपके बाँहों में शाम हो ,
आपकी महफ़िल में मेरा नाम हो 
और आपके गुलशन  में हमारा गुलफाम हो |

कभी यूँ भी  तो हो 
कोई उम्मीद से हमें मुहब्बत सिखाये ,
इश्क-ए-महफ़िल में हमें सिरकत सिखाये ,
और करीने से उल्फतों के नजाकत सिखाये |

कभी  यूँ भी तो हो 
हम बाहों में रहे तुम्हारे ,
कब तक जियेंगे बस सपनो के सहारे ;
हम बंद  आँखों से  देखते रहे ,
हकीकत के चश्मदीद गवाह |
कोई चूमे हमें बेपनाह 
हम खोये रहे लापरवाह ,
और इन् दूरियों से दूर कोई मकाँ बनाएं 
एक  गीत लिखें : 
और अन कहे लफ़्ज़ों का कारवां सजाएं ||

कभी यूँ भी तो हो 
हम इत्तेफाके आपसे मिलें |
साजिश के तहत तो सब मिलते हैं ||

*  dedicated to and with inputs from Grim .