Skip to main content

Posts

Showing posts from June, 2014

रुको ,ठहरो जरा

रुको ,ठहरो जरा
जरा दम तो लो |
गेस्ट हाउस का जो गार्ड है ;
कभी उसके सिरहाने की आधी टूटी कुर्सी पे बैठा करो |
मचलते हवाओं का रुख महसूस करो ;
वो सामने हाईवे पे दौड़ती जो जिंदगी है ;
कभी ठहाके लगा के हंसो उनपे |
वो भी तो सुनें
उनके लाचारी की कारस्तानियां ,
कितनी दूर पहुँच गयी है |

रुको ,ठहरो जरा
जरा दम तो लो |
दो एक खींचती साँसों का एहसास तो करो ;
अर्सों से किसी ने इनकी सुध नहीं ली है
एक चाय तक नहीं पूछा |
सुना है :
तुम्हारी एक नन्ही सी बेटी है
महीने भर से मिले नहीं तुम
सुना है
सोते जागते तुम्हारा नाम लेती है |
तुम्ही ने बताया था पिछली रात बियर पीते  पीते
जब चिली और ब्राज़ील १-१ पे अटके थे |
और ये एक बात
शायद तुम्हें एहसास नहीं :
तुमने तीसरी बार दुहराया है
"मैं जब घर पे रहता हूँ ना अनुपम
सिगरेट की जरुरत ही नहीं पड़ती || "
रुको ,ठहरो जरा
जरा दम तो लो |

A short meet with Dr. Ithape and The infamous IB report

It was almost 12 noon ,as we the Bus stopped at the stand . Manish while trying to connect a call smiled to a side line car driver , "Priyadarshini ? "
 The driver nodded "Yes sir ,I am sent from Priyadarshini ".

As we reached i realized we are heading towards some doctor's clinic .I can smell the scent of doctor's clinic architecture and style in the building . Priyadarshini Grameen and Adiwashi Sevabhawi Sanstha ,sangamner is an NGO .Its charismatic to note that it has got a two floor well furnished office . And we three people have come here from 120 kms to evaluate and judge the suitability of this organization ,precisely speaking to mark whether the organization can handle watershed projects or not ?

Dr Ithape has certainly got the typical clear forehead , shaved ,hairs well oiled ; theoretically a doctor look that he has maintained since ages .Dr ithape heads the organization as he goes on prould showing us documents of his work and contribution .His pap…

मैंने सोच रखा है

मैंने सोच रखा है 
संवेदनाओं के सारे दरवाजे बंद करने का |

इस बार जब वो लड़की 
चुप चुप सी सामने आएगी 
मैं सोच रखा है : गले नहीं लगाउँगा ||
इसी बहाने जो उसके अश्क मेरे कंधे पे रिसते हैं 
मैंने सोच रखा है :कंधों को और नहीं नहलाऊँगा ||

जो मेरी खामोशियों के फाहे में उसके जख्म छिपते हैं \
मैंने सोच रखा है , 
अब ये चुप्पी  तोड़ूंगा : 
मैंने सोच रखा है 
अब उसके जेहन  में  एक बीज बोना है :
 अफसोस नहीं ; आक्रोश का |
दीवारों पे मत्थे पटक पटक कर लड़ने का 
अपनी लकीरों के वास्ते अपनों से  झगड़ने का ||
दौर आ गया है पलट के वार करने का 
अपने माथे की इज्जत अपने तरीके से तैयार करने का |

मैंने सोच रखा है 
इस बार जो वो लड़की अपने जख्म ले कर आएगी 
मरहम नहीं लगाने दूंगा ;
इस बार जख्म को जीना है 
जख्म के जवाब में
एक बेहतर जख्म देना है ||

Adapted and inspired from Prasoon Joshi's इस बार नहीं 

हाँ मेरे दोस्त वही बारिस ||

कल रात से पटे थे फैले हुए बागानों में ;
गुलमोहर के फूल पत्ते |
सारे बहकर आ गए हैं 
मेरे चबूतरे के सामने वाली निचली जमीं पे |
लिपट जाते हैं पैरों से हर बार 
जो मैं गेस्ट हाउस से  निकल कर ऑफिस तक जाता हूँ ||
हाँ मेरे दोस्त वही बारिस 
जो कल तक आसमान के मुखड़े पे 
जुल्फों की तरह बिखड़ती थी 
और संवर के निकल जाया करती  थी 
आज ठहरी है इस शहर में |

हाँ मेरे दोस्त वही बारिस 
आज कांच की खिड़कियों पे
 सिसक सिसक कर टपक रही है जैसे 
अर्सों से किसी ने इसकी खबर तक नहीं ली |

हाँ मेरे दोस्त वही बारिस 
आज आई है बड़े संजीदे से ,बड़े करीने से |
बिलकुल पहले इश्क़ की पहली गुड न्यूज़ की तरह 
पसर गयी है 
पिच रोड से लेकर कार्ला ब्रूस के क्रिकेट कंपाउंड तक 
रोज कॉटेज से लेकर रोज गेस्ट हाउस तक |

हाँ मेरे दोस्त वही बारिस 
आज ठहरी है इस शहर में |
एक वक़्त के लिए ही सही 
मॉनसूनी आशाओं के पर्चे बाँट रही है ;
सड़क के किनारे खड़े हो कर ||

मैं उत्तर प्रदेश हूँ।।

मैं तुम्हारा आरोपी हूँ , मैं तुम्हारी प्रत्याशी हूँ ।   मैं तुम्हारा जिस्म हूँ , मैं तुम्हारी ख़ामोशी हूँ ।।   मैं तुम्हारी द्रौपदी के मत्थे का केश हूँ।
   मैं उत्तर प्रदेश हूँ।

मैं तुम्हारी याचना हूँ मैं तुम्हारा अनुरागी हूँ
मैं तुम्हारी लुटती मार्यादा का सहभागी हूँ ।
मैं तुम्हारे डूबते आँखों का आवेश हूँ ।
मैं उत्तर प्रदेश हूँ।।

मैं अपनी शाखों में अरमानों के लाश ढोता हूँ।
जर्रे जर्रे में बिखरा हूँ सिसकियों में रोता हूँ।
मैं शासन और व्यवस्था का
जर्जर क्षीण अवशेष हूँ।
मैं उत्तर प्रदेश हूँ।।