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Showing posts from July, 2014

AUGUST

वो पहली बार  जब अगस्त में बारिस आई थी  लेट मानसून का लिबास ओढ़े, छत के किनारे किनारे से  रिसते हुए कुछ छीटें  मेरे बालकनी में आकर जमा हो जाय करती थी | कुछ जज्बाती थपेड़े  कांच के खिड़कियों को नॉक करते रहते थे  जैसे एक अदबी मुस्कराहट लिए  कहते हों: " देर आया हूँ , खैर दुरुस्त आया हूँ | मोहल्ले की बिजली आती थी , जाती थी ; आती थी , जाती थी ; बारिशों ने एक पूर्णविराम लगा दिया | सुना है कोई उम्रदराज सा पीपल  औंधे मुह गिरा था बिजली के तार पर ; गले में V शेप बन गया था | सुसाइड था , वो कहते हैं  बेचारा कब तक अपनी उम्र को खींचता  गला टूंड पड़ गया था , बारिश की ख्वाईश में | सुना है जाते जाते लिख गया है एक नोट : "कितनी देर लगा दी तूने आने में  मैंने जिंदगी के आखिरी लम्हे घुट घुट के जिए हैं |
वो पहली बार  मुझे एहसास हुआ : एक उम्रदराज पीपल घर घर में रहता है ; किसी को परवाह नहीं ||

Abolishing CSAT will be a factional, forged and unsubstantiated analogy of reservation policy .

With meters of political dictates rising across the streets , Its arguably an irony to believe that street show and vandalism is trying to fix a negotiation between political responsibility and UPSC's autonomous stature . While the polity has its responsibility to address the expectations of all those entities who have inked their fingers and voted , UPSC has a clear cut responsibility to ensure an examination algorithm which fetches us best of the officers to run administrative , police , forest , revenue , trade ,post ,railway ,audit and finance ,traffic and all such titles belonging to state, union and concurrent list .


We don't belong to an era of paper and ink , rather we belong to an era of excel spreadsheets , R studio .Reports and drafts these days are based on statistical elements .Histograms and pie-charts are readily used to express an idea , a project or a process which passes through the desk of civil servants.CSAT is a brain child of changing scenario is works of …

परछाईयाँ

तुम्हारे बेजुबान साये जब इस मोड़ से जाते हैं 
ठहर जाती है नज़र दो चार लम्हे के लिए 
उतर कर पटरियों से चला जाता हूँ
किनारे  किनारे  बिछे गिट्टियों पर |
एक्सीडेंट के खरासों को गिन गिन कर रातें कटती है |
साये बोलते नहीं ,
खैर इतने जख्म दे जाते हैं |

क्यों दे रखी है तुमने इसे
 बेफिक्र घूमने की आजादी 
अपने परछाईयों से लिपटकर क्यों नहीं सोती हो ?

तुम्हारे दर्द

देर तक सोचता रहा
मिल जाए दो एक लफ्ज़
तो बुन दूँ तुम्हारे दर्द
कुछ स्केच खींच कर अचरे को सजा दूँ
जैसे कुछ अधखिले गुलाब तूफानी मंजर से परेशां परेशां से
देर तक सोचता रहा
ट्रेन इटारसी से खुल कर अलाहाबाद पहुँच गयी
कुछ भी तो मिला नहीं।
बीच में किसी चैन पुल कर रोकी थी
शायद उसका घर यहीं कहीं पड़ता था।
पूरा कम्पार्टमेंट इस मुद्दे पे बहस में लगा था
तब भी मैं तुम्हें ही सोचता रहा
कुछ भी तो मिला नहीं।
शायद तुम्हारे दर्द की
आदत सी हो गयी है।
और
आदतों पे नज़्म नहीं लिक्खे जाते।

मोहल्ला

मुहल्ले के बीचो बीच से एक पगडण्डी गुजरती है।
सुना है एक ज़माने से
हम और उनको बाँटते आई है ये।
हम में अहम् है 
और 
उनमें जिंदगी जीने की कशमकश ।
शाम होते ही निकल पड़ते हैं 
पगडण्डी पे
ईंटों और खपरैल के टुकड़े लिए 
हमारे और उनके बच्चे साथ साथ ।।
कोई यूनिक सा खेल है ये ।

कभी कभी शाम ऐसे ढलती है -2

कभी कभी शाम ऐसे ढलती है
तुम्हारे होठों की रागिनी छूकर गुजरती है
मेरे सेहरे से चेहरे को
जब तक हाथ उठाता हूँ उसे पकड़कर कैद करने को
निकल जाती है दूर गलियों से परे

कितनी आसान हो जाती जिंदगी
गर तुम्हें कैद कर पाता किसी बंद बक्शे में
दिल लगाने के लिए लड़ लिया करते जब तब
किसी भी बेजोड़ बेवजह से मुद्दे पे
जैसे कोई पार्लियामेंट का डिबेट चलता है

DAY 40 #iNTERN DIARY and a little mango plant

The ultimate day at office .
last night when our team returned from sholapur ,one of the organization gifted us a  grafted Mango plant , and finally I decided to plant it in the office garden .

अर्सों  बाद
 जब ऑफिस के रिजेक्टेड चेयर्स
 गार्डन में डाल दिए जाएंगे ||
शायद दो एक दुपहरी ये लोग 
इस अमिया तलहट में बिताएंगे |
करेंगे याद तो ये एक बात याद आएगी 
कहेंगे 
" एक लड़का आया था ,
अपने अरमानों के बीज बो के गया |
कह गया है , 
फिर कभी वक़्त ने अगर खींच लाया इधर 
देखूंगा मेरी ख्वाइशों ने कितना आसमान छुआ है "|