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Showing posts from 2016

ख्वाब और हुकूमत

बम्बई गया था, अपनी पुरानी जनता से मिलना जुलना हुआ | थोड़ी जिंदगी की तलाश हुई, थोड़ा प्रेम का  भी तलाश हुआ | वर्क, लाइफ और वर्क इस लाइफ पे भी बातें हुई | कॉर्पोरेट की चार दीवारी में बंद कुछ सपने भी खुले, कुछ अपने भी खुले | फ्लाइट में बेकार सी ३०० रुपये वाली मैगी खाते खाते मैंने सफर का लेखा जोखा एक टिश्यू पेपर पे लिखा | इस कविता में जितना मेरा है, उतना ही शायद आपका भी, पढ़िए |

वक़्त ही वक़्त चल रहे हैं साथ मेरे
ख्वाब ही ख्वाब पल रहे हैं साथ मेरे |
मैं एक ख्वाब से दूसरे ख्वाब को झाँकता
मैं ख्वाब दर ख्वाब को अपने तराजू आंकता |
कितना सरल है;
ख़्वाबों के अट्टालिकाओं को बनाना |
कितना मुश्किल है ;
ख़्वाबों के अट्टालिकाओं पर
यथार्थ का पताका लहराना ||

मैं एक ख्वाब की किताब को
बंद करके सो जाऊँ भी तो
नींद मुझे आएगी क्या ?
गर नींद आ भी गयी तो
कोई ख्वाब मुझे सताएगा क्या ?
मैं ख़्वाबों को लेकर सोता हूँ
मैं ख़्वाबों को लेकर जगता हूँ,
मैं अपने दाएं कंधे पे
ख्वाब लटकाये चलता हूँ |
मैं ख़्वाबों का शायर हूँ
मुझे मुट्ठी में बंद कर पाओगे क्या ?
ये तो सवाल जीने मारने का है
जो मैं तेरे दरीचे बैठा हूँ |
तेरी हुकुमत पे…

मेहबूब

मैं समय का एक कलंदर
एक मदारी मेरे अंदर
पीछे रेत का सफर
और आगे एक समंदर
अपने रंगों में डूब खोया
इत्ती सी मेरी चेतना है |
पर मेरे मेहबूब तेरा
रूठ जाना कब मना है ||

हम तेरे माकूल कारिंदे
चलते फिरते मुर्दे जिन्दे
डर है उच्छवास मेरा
क्रंदन मेरी आसना है |
पर मेरे मेहबूब तेरा
मुस्कराना कब मना है ||

हाथ की लकीर लेकर
हम चले थे एक सफर में
ख़्वाबों के फ़कीर बन कर
तुम मिले थे एक शहर में
खौफ को मुट्ठी में बाँधे
अब बस सरपट दौड़ना है |
पर मेरे मेहबूब तेरा
लड़खड़ाना कब मना है ||

हैं मुकम्मल दूरियां
शहर शहर के बीच में
हैं मुकम्मल खामोशियाँ
पहर पहर के बीच में
हमारे तुम्हारे बीच में
एक उम्र भर का सामना है |
पर मेरे मेहबूब तेरा
आँखें बिछाना कब मना है ||

हम आपकी आरजू को ना करें कैसे ||

रुह- ए- आबरू खून-ए-जां बयां करें कैसे
हम आपकी आरजू को ना करें कैसे ||

हर एक शक्ल शहर का पानी पानी है
हम एक माचिस जला कर धुआं करें कैसे ||

मिट्टी सारी खोद कर ईमारत खड़े कर दिए
हम इन जमीनों को गुलिस्तां करें कैसे ||

बेखुदी का रिश्ता है मेरी और वफाई का
यूँ ही एक बार फिर से वफ़ा करें कैसे ||

हंसी की पिंक पेंट

कुछ लोगों ने
उसकी कलाई में चमकती घड़ी देखी
रंग -ओ - रौनक में  परी देखी
पैर में चांदनी पायल देखा
चेहरे पे खिलता कमल देखा |

मैंने उसे पूरी नज़र देखा
उसका घर देखा , शहर देखा |
उसके करीब बैठे बैठे
उसको पूरा सफर देखा |
और कुछ लोगों के नज़रों का
उसके ऊपर कहर देखा
मैं आपको बताता हूँ
कुछ लोगों ने जो देखा
कितना फर्जी देखा है |
उसके एक पैर में  पायल है
लेकिन  दूसरा घायल है |
उसकी कलाई में जो घड़ी है
सदियों से रुकी पड़ी है |
होठों पे एक पुती मखमली है
लेकिन पीठ पे सिगरेट जली  है |

मैंने और भी  देखा है
जो कुछ लोगों ने नहीं देखा |
उसकी कत्थई सी साड़ी में
रात की रानी जड़ी है |
जैसे किसी बेबसी के दीवार पे
हंसी की पिंक पेंट चढ़ी है ||



काला चश्मा

तुम्हारी सारी तस्वीर
एक एक कर पलट ली मैंने
तुम्हें खोजने की कशमकस में |

हर एक तस्वीर में तुम हँस रही हो
ऐसा होता है क्या ?
लेम्प की लौ थमी हुई है
ऐसा होता है क्या ?
तुम्हारी जुल्फें भींगी है
और बारिस का नाम -ओ- निशान नहीं
ऐसा होता है क्या ?

मुझे वो एक तस्वीर चाहिए
जिसमें तुम्हारे चोख के आँसू
सूख रहे हों चेहरे पे |
वो एक तस्वीर
जिसमें तुम परेशान हो
धूप से बचते बचते
सड़क किनारे दौड़ रही हो |
वो एक तस्वीर
जिसमें तुम्हारी हँसी से
फट जाते हैं बादल
रेगिस्तान में उग उठता है फूल |
वो एक तस्वीर
जिसमें मेरी मुट्ठी में हो तुम्हारी जुल्फें
मेरे होठों पे टिके हो तुम्हारी बंद आँखें
वो एक तस्वीर
जिसमें लफ्ज़ हो
जो मेरी पत्थर सी आँखों पे
सदियों से अटके पलकों को
झपकने पे मजबूर कर दे ||

मुझे वो एक तस्वीर चाहिए
जिसमें सबकुछ धुंधला सा हो
हर एक हँसी का तात्पर्य ख़ुशी न हो
हर एक सिकन, जख्म न हो |
क्योंकि
जिंदगी संघर्ष की सच्चाई है
"काला चश्मा" वाली फेंटासी नहीं |
क्योंकि
मैं तुम्हारे साथ जीना चाहता हूँ
फिल्में बनाना नहीं ||

चीन की दीवार

मेरे साथ चलोगी क्या
चाँद पर
साथ साथ चाँद पर चलेंगे
और चाँद से चीन की दीवार देखेंगे |

खैर
चीन की दीवार है;
चीन जाके भी देखी जा सकती है
लेकिन फिर काफी बड़ी नज़र आएगी,
हमारी बाहें उन्हें आंक नहीं पाएंगी
हमारी नज़रें उसे एक टक में समेट नहीं पाएंगी
और
हमारी मुहब्बत उसके सामने नाचीज़ सी लगेगी |

इतने विस्तृत जमीं
और
इतने फैले आसमान में
उस चीन की दीवार का इतना भी क्या वजूद ?
जैसी भी है
है तो एक दीवार ही
किसी के मुहब्बत से बड़ी कैसे हो सकती ?

इसीलिए कहता हूँ
मेरे साथ चलोगी क्या
चाँद पे
वहीँ से चीन की दीवार देखेंगे
और फिर खिलखिला के हँसेंगे
"हमारी मुहब्बत के सामने
कितनी  नाचीज़ सी है चीन की दीवार" |

तोमाय हृद मझार राखिबो छेड़े दिबो ना

पिछले चंद दिनों से एक टेक्नोलॉजी ब्लॉग तैयार कर रहा था और इन चंद दिनों में मैंने ना जाने कितने टेक्स्ट नज़रअंदाज कर दिए जिसमें लिखा आता था "तुम्हारी पोएट्री नहीं आ रही आजकल" | टेक्नोलॉजी ब्लॉग तैयार हो गया है, अभी व्हाट्सएप्प ग्रुप पे घूम रहा है, टेस्टिंग पीरियड में है समझिये | एक दिन पब्लिक में भी लाएंगे तो इत्तला करेंगे | फिलहाल ये एक  कुछ कुछ गजल जैसा पढ़िए | "ह्रदय के मझधार" इस खूबसूरत लफ्ज़ की प्रेरणा मुझे एक बंगाली गीत से मिली जिसके बोल हैं : "तोमाय हृद मझार राखिबो छेड़े दिबो ना" | इस एक गजल से मैं "क से कलकत्ता" नाम का एक सीरीज शुरू कर रहा हूँ जिसमें ऐसी नज़्में, कवितायेँ, गजल लिखी जायेगी जो कहीं कहीं ना कहीं कलकत्ता के गीतों से, या फिर गलियों से प्रेरित होंगी | ये सिलसिला चलता रहेगा | फिलहाल गजल पढ़िए


ह्रदय के मझधार  में रखूँगा मैं तुझे
कुछ इस तरह से प्यार मैं रखूँगा मैं तुझे ||

जिंदगी जश्न हो या हो कू-ए-तिश्नगी
हर दौड़ के सरकार में रखूँगा मैं तुझे ||

तुम मेरे किस्से में दर्ज रहो न रहो
अपने हर एक अशआर में रखूँगा में तुझे ||

वो एक दुकां, जिसमे…

इतिहास*

'तुम खूबसूरत हो' ये मैं तुम्हें तब तब कहूँगा जब जब मेरा दिल करेगा । 'तुम खूबसूरत हो' मैं ये तुम्हें तब भी कहूँगा जब जब तुम्हें जरुरत होगी । जब बिन मौसम बरसात होगी मैं कहूँगा 'तुम खूबसूरत हो ।' जब शायरी की बात होगी मैं कहूँगा 'तुम खूबसूरत हो ।' जब तुम्हारे चेहरे पे धूप आएगी मैं कहूँगा 'तुम खूबसूरत हो ।' जब चलते चलते रुक जाओगी चेहरे कुम्हला जाएँगे मैं कहूँगा 'तुम खूबसूरत हो ।' तब जबकि शाम होगी बत्तियां आधी बुझी होगी मैं कहूँगा 'तुम खूबसूरत हो ।' तब जबकि रात होगी सितारों की बारात होगी मैं कहूँगा 'तुम खूबसूरत हो ।' तुम सुनते सुनते ऊब जाओगी लेकिन मैं कहता रहूँगा 'तुम खूबसूरत हो ।'
मुझे नहीं मालुम तुम कितनी सच हो कितनी परिकल्पना | मुझे नहीं मालुम तुममें कितना जमीन है और कितना आसमां । मुझे नहीं मालुम तुम हो कहाँ और मैं हूँ कहाँ | मुझे बस इतना मालुम है की तुम खूबसूरत हो और इस बात को इतिहास में दर्ज करना मेरी जिम्मेदारी है ।। *नज़्म साराह के की पोएट्री " व्हेन लव अराइवेस "…

खिड़कियां |

आज मैंने फैसला किया है
अपने घर की
सारी खिड़कियों को बंद करने का |

मेरी खिड़कियों से नजर आती हैं
कितनी सारी खिड़कियां
और हर एक में
कैद बैठी हैं कितनी सारी नज़्में
ये नज़्म इश्क़ का नहीं
ये नज़्म मुहब्बत का नहीं
ये सारी नज़्में हैं
हताशा और निराशा की
संघर्ष और तलाश की
जीवन और पलायन की
जो कहना मुझे आता नहीं |
इसीलिए
आज मैंने फैसला किया है
अपने घर की
सारी खिड़कियों को बंद करने का ||

तुम आओ तो सही |

मैं यहीं हूँ
यहीं रहूँगा
तुम आओ तो सही |

मैं तुम्हें कभी
ये कहने का मौका नहीं दूंगा
" यार तुम तो ठहरे ही नहीं "
मैं यहीं हूँ
यहीं रहूँगा
तुम आओ तो सही |

तुम आओ तो सही
की हम इस घर में
सारी बत्तियां बुझा कर
एक नन्ही सी मोमबत्ती जलाएं
और गीता दत्त की  गीत गुनगुनाएं
" जाने क्या तूने कही
जाने क्या मैंने सुनी
बात कुछ बन ही गयी "
मैं यहीं हूँ
यहीं रहूँगा
तुम आओ तो सही |

तुम आओ तो सही
की हम एक बार फिर से
एक ही कॉफ़ी मग में
दो दो स्ट्रॉ डुबाएं
और चूँकि ये कलकत्ता है
यहाँ चाय भी खाते हैं
कॉफ़ी भी खाते हैं
तो कुछ तुम खाओ
कुछ हम खाएं |
ज्यादा नहीं मांगता
बस इतना सा ही
कि
 मैं यही हूँ
यहीं रहूँगा
तुम आओ तो सही |

स्विच बोर्ड

मेरे घर का स्विच बोर्ड
मेरे आते ही चल पड़ता है|
मेरे परछाइयों के साथ चलती है
एक दूधिया रौशनी
डाइनिंग हॉल की लाइट जल उठती है
कमरे के पंखे नाचने लगते हैं |

मेरे ठीक सामने वाले घर में
बिलकुल धुप्प अँधेरा है, आज भी |
उस घर की औरत
सारे लाइट, पंखे बंद कर
बालकनी में बैठी रहती है
एक चादर बिछा कर वहीँ सो जाती है
और
वक़्त होने पर
अपने मोबाइल की रौशनी में
अपने बालों को संवारती है |

फिर एक आदमी
जिसके दाएं कंधे पे
एक काले रंग का थैला होता है
घर का डोरबेल बजाता है |
वो औरत  उठती है
लम्बे थम्हे हुए सांस की तरह टूटती है
घर का स्विच बोर्ड चलने लगता है
दीवार दूधिया सा हो जाता है
सारे पंखे दौड़ने लगते हैं
और
दरवाजा खुल जाता है |

इस शहर में बिजली कितनी महंगी है
इस शहर में औरत कितनी सस्ती है ||

आत्मनिर्भरता की चोली में एक एकाकीपन का सृजन

पूरा आसमान एक  कॉर्पोरेट फर्म है साहब | और जो परियाँ हैं, जिनका जिक्र दादी - अम्मा  के कहानियों में हुआ करता है, वो सब एक कॉर्पोरेट फर्म के एच आर हैं, सेक्रेटरी हैं, कंसलटेंट हैं| और चूँकि ये कलकत्ता का आसमान है, तो यहाँ  चाय और कॉफ़ी ब्रेक तो होता ही है, सिगरेट ब्रेक भी होता है| कभी कभी सिगरेट ब्रेक में  ये परियाँ अपने किसी सीनियर को सामने देख कर, अपनी आधी जली सिगरेट नीचे फेक देती हैं, जिसे हम और आप शुटिंग स्टार कहते हैं| 

कलकत्ता से एक नयी शुरुआत करते करते मुझे ऐसी ही कहानियां याद आती हैं आजकल| 20 साल अलग अलग शहरों में अलग अलग अट्टालिकाओं में दीवाने की तरह घूमते घूमते आखिर आज कोलकाता में आ कर ठहरा हूँ| अगर दिल्ली की पहचान उसके मेट्रो से है, मुंबई  की पहचान उसके व्यस्तता से है तो कलकत्ता की पहचान उसके ठहराव से है| सरकारी कागजों पे नाम जरुर बदल गया है, लेकिन शाम की चौकड़ी, चाय पे ताश के  पत्ते, और सिगरेट की आबोहवा आज भी उतनी ही है, जितना मैंने अपने इतिहास के टीचरों से सुना था| 

सबकुछ खुद से, अपने दम पे करने का खौफ मुझे  छुटपन से सताता रहा, लेकिन कभी पूरा नहीं हुआ ।लगता है अब होने वाला है|…

फेसबुक डीपी

जाने से पहले हमने सोचा की क्यूँ ना एक छोटी सी ट्रिप की जाए और इस शर्त पे की जाए कि ट्रिप में DSLR वाली फोटोग्राफी नहीं होगी | फोटोग्राफी कभी कभी हम से ही हमारे लम्हों को छीन लेती है| एक ट्रिप हो जाए और उसके बाद डीपी ना बदले तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा | ऐसा नहीं है की फोटो ही नहीं खींचा, एक दो मोबाइल में खींच लिए हैं, आखिर जिंदगी का भी तो एक टाइमलाइन होता है| खैर, Puri Beach पे बैठे बैठे, फोटोबाजी पे काफी चर्चा हुई | एक कविता भी लिखी है मैंने : उन्वान है : फेसबुक डीपी | पढ़िए झोलू राम ने डीपी लगायी फेसबुक पे धूम मचाई | झट से टपके लल्लन काका "फोटो क्रेडिट तो देदे आका" | झोलू ने तुरंत मारा एडिट लल्लन कक्का को मिल गया क्रेडिट | उधर से गुजरा सोमू हलवाई " भाई, झोलू भाई कुछ ओसम (awesome) पिक है भाई |

चमन लाल ने देखी बहती गंगा कूद गया, चट होके नंगा "अरे झोलू, इ बेल्ट तो हमार लगता है हो हमको भी तनी क्रेडिट तो दो " | लगे हाथ आ टपका सोनू नाई " वाह झोलू भाई , जंच रहा है तुमपे हमरा टाई " | फिर आ बैठा केलकर मराठी " कुछ ओसम पिक है भाऊ …

दो कवितायेँ : बुंदेलखंड और "अफज़ल हम शर्मिंदा हैं"

1. बुंदेलखंड

उसके पास सबकुछ था
रोटी थी, खोपड़ी थी
एक अच्छी खासी झोपड़ी थी
मुट्ठे भर बीड़ी थी
और सिलिंडर वाली सब्सिडी थी|

उसके पास सबकुछ था
घर था, जमीन था
महिंद्रा वाला ट्रेक्टर था
और थ्रेशर वाली मशीन थी |

फिर
जमीन प्यासी रहने लगी
मशीन प्यासी रहने लगी
प्यासा जमीन बिक गया
प्यासी मशीन नीलाम  हो गयी |

तब  जा के एक दिन
उसके खोपड़ी में एक ख़याल आया |
उसने गैस वाली सब्सिडी जला कर
मुठ्ठी वाली बीड़ी सुलगायी
फिर अपनी खोपड़ी जलायी
और साथ में पूरी झोपड़ी जलायी |

इतनी गर्मी में भी
इत्ती सर्दी थी कि
जब उसकी झोपड़ी जल रही थी
सारा बुंदेलखंड ताप रहा था ;
और अपना अपना कल नाप रहा था ||

2. "अफ़ज़ल हम शर्मिंदा हैं"

डर लगता है
पटना के गाड़ियों को ओवरटेक करने में
जे अन यू (JNU) की लड़कियों से हैंड सेक करने में |

डर लगता है
नार्थ - ईस्ट की नन्ही आँखों में
सदियों से कायम ख़ौफ़ से
स्मार्ट फोन की स्मार्ट दुनिया के
स्मार्ट शो ऑफ से |

डर लगता है
कि कितनी जीपें आई - गयी
बुंदेलखंड सूखा का सूखा है
स्कीम के बैनर चमक रहे हैं फिर भी
झुग्गी वाला बच्चा भूखा है |

डर लगता है
मुंबई के बम ब्लास्ट से
यु पी बिहार के कास्ट से |

डर…

A date so late that romance might suffer

On 18th  April, I was sitting in a big auditorium, clapping and smiling for people who were part of 5 years of IIT journey. It was a farewell award ceremony at IIT Kharagpur. Just few minutes ago I gave a two minute speech from the stage. People loved it; at least the reception voice meant so.Yes the speech has 700 views on Youtube (P.S. That’s too much for IIT anyway).
Two minutes later I was cross checking my mail. Roadrunnr, now Runnr has delayed my date of joining to 5th December. For a moment I felt it’s a birthday present as the date approximately coincides with the same.
An hour later I was working on my cv, designing it again as a literal winter was coming. A day later I had an account with iimjobs.com, my linkedin tagline felt the metamorphosis. A fear of insecurity hovers over the fear of delay.
This is not my story. This is the story of 15+ people hired by Runnr from IIT Kharagpur, and a similar figure hired from IIT Rorkee and other colleges. Except for a few, joining dates …

रोटी और तनख्वाह

मैंने सोचा था जिस दिन मुझे ये एहसास हो जाएगा की मेरी रोटी पक्की है, मेरी तनख्वाह पक्की है, उस दिन मैं भर दूंगा सारा उधार जो मैंने नज़्मों से ले रखा है उस दिन मैं पूरा कर दूंगा वो सारी फरमाइशें जो नज़्मों ने मुझसे की थी और मैंने आँखें बंद करके हामी भर दी थी वो सारे वायदे, वो सारी कवायदें जो मैंने नज़्मों के माथे पे हाथ रख कर की थी | फिर एक दिन मेरी रोटी पक्की हो गयी मेरी तनख्वाह पक्की हो गयी उस दिन मुझे एहसास हुआ लफ़्ज़ों के क़र्ज़ रोटी और तनख्वाह से भरे नहीं जा सकते |

बागी

जिस कदर सलाखों में कैद
भगत सिंह पढ़ा करता है लेनिन को
ठीक वैसे ही मैं पढता हूँ तुझे |

मैं पिंजरे में कैद बागी हूँ
मैंने उतार दिए हैं पिंजरे की दीवारों पे
क्रांति की सारी तस्वीरें |

जब भी आता है खिड़की से अंदर
रोटी  का वो एक टुकड़ा
मैं भेजा करता हूँ बाहर
कागजों के चिठ्ठे
जिसमें दर्ज हैं
हमारी तुम्हारी तकदीरें |

मैं अपने नाख़ून के बढ़ने का
 इंतजार करता हूँ हर महीने
नाखूनों से कुरेद दिए हैं मैंने
इन दीवारों पे वो सारी नज़्में
जिसे कोई चीख के
एक बार पढ़ भी डाले
तो पिघल जाएंगी ये सलाखें |

जिस दिन पिघल जाएंगी ये सलाखें
मिलूंगा मैं
वहीँ कहीं
जहाँ कोई आता जाता नहीं |
शायद तुम भी आओगी नहीं ||

रेल और पुल

तू किसी रेल सी गुजरती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ | _____ दुष्यंत कुमार |

**********************************************************************

जब ट्रेन आती है , तुम्हारी याद आती है;
एक स्क्रीच वाली ध्वनि के साथ
तुम्हारी याद आती है |
तुम दुष्यंत कुमार की गजल जैसी हो
रेल सी गुजरती हो
मैं विद्रोही का पत्थर
देवता जैसा नज़र आता हूँ
देवता नहीं हूँ |
एक टूटे हुए पुल का अवशेष मात्र हूँ
जिसे किसी ने  ठोकर मार कर
सड़क किनारे पहुँचा दिया
और फिर किसी ने
फूल बाँध कर टीका चढ़ा दिया |


मैं भी दुष्यंत कुमार की गजल जैसा हुआ करता था |
तुम रेल सी गुजरती थी
मैं पुल सा थरथराता था
तुम गुजरती थी, मैं थरथराता था
तुम गुजरत थी, मैं थरथराता था |
और अब मैं टूट के गिर गया हूँ
"ममता" के फ्लाईओवर की तरह बिखर गया हूँ |
लेकिन तुम रेल हो
तुम गुजरती रहना
नये  पुल का  तलाश करना
और गुजरती रहना |
क्यूंकि तुम जिंदगी को जोड़ती हो
क्यूंकि तुम लम्हों को खुबसूरत बनाती  हो
क्यूंकि तुम हर यायावर के सफ़र की साथी हो |

मैं भी कोशिश करूँगा
की इस बार
पढ़े लिखे अभियंताओं के हाथ लगूं |
पत्थर से पुल बनूँ
और तुम रेल सी गुजरो कभी…

खूबसूरत

कितना खूबसूरत होता -
हमारे तुम्हारे बीच जो एक
दीवार बन गयी है
उसमें एक खिड़की भी बन जाती |
कभी हम खोल लिया करते
और देखते तुम सुकून से सो रही हो;
कभी तुम खोल लिया करती
और देखती मैं सुकून से सिगरेट जला रहा हूँ ||

तुम्हारे और हमारे बीच
एक इश्क का रिश्ता होना
सबसे खूबसूरत नहीं होता |
सबसे खूबसूरत होता है
कुछ नहीं होना
और फिर भी इतना कुछ का हो जाना |
सबसे खूबसूरत होता है
टूटे रिश्ते में भी
एक दूसरे का ख्याल आना |

सबसे खूबसूरत लम्हें तस्वीरों में नहीं आते;
इन्स्टा ग्राम की वो सारी पिक्चरें
सबसे खूबसूरत नहीं होती ;
सबसे खूबसूरत होता है
वीरान सड़क पे
धुप्प अँधेरे में
एक थके हुए दोस्त का
आपके कंधे पे सो जाना |

वो एक लम्हा
जिसमें पल रहा है
आपके दर्द के सहारे किसी का सुकून ;
सबसे खूबसूरत होता है
वो एक लम्हा
जिसे कोई मेगापिक्सल कैद नहीं कर सकता |

पताका

मैं भी अपनी जेब में
एक पताका लिए चलता हूँ |
और इस इंतजार में चलता हूँ
की एक दिन
एक मोटी करची पे इस पताके को बाँध दूंगा |
यही मेरा तुम्हारा पताका होगा
और इसी के सामने
हम - तुम सर झुकाएँगे नहीं, सर उठाया करेंगे |
फिर तुम क्या और तुम्हारे खुदा का बच्चा क्या
मंदिर क्या काबा क्या और नानक का ढाबा क्या
मैं सबको एक कतार में
कब्र में सजाऊंगा
और गंगाजल छींट कर जला दूंगा |

इसे तुम अपना विलय मत समझो
यही तुम्हारा सृजन है;
मैं तुम्हें जला कर कुंदन बनाऊंगा |

और जबतक तुम जल रहे होगे
मेरा साम्राज्य होगा
और खूबसूरत होगा |
अँधेरा मेरा खुदा होगा ,
जिसकी आगोश में तुम और हम
एक जैसे नज़र आएंगे |
ख़ामोशी मेरा देवता होगा
जिसके सपथ तले तुम और हम
सत्यं वद, प्रियं वद गाएंगे |
मुहब्बत उसका प्रसाद होगा
जिसे हम और तुम पाएंगे
जिसे पाने  के लिए कतारें नहीं होंगी
और अगर कतारें होंगी भी
तो उन्हें काबू करने के लिए सरकारें नहीं होंगी |

मुझे मालुम है
तुम मीडिया की तरह
अंगुली उठा उठा कर
ये जानने की कोशिश करोगे
की मेरे पताके का रंग क्या होगा ?
जो मैं कभी नहीं बताऊंगा |
कभी नहीं |

मेरा मिट्टी का घर है, छत चाहिए |

न फेसबुक चाहिए, न टिंडर चाहिए
धुंए में दम घुंटता है, सिलिंडर चाहिए |

न सन गिलास चाहिए न स्कर्ट चाहिए
मेरा नंगा बदन है बुशर्ट चाहिए |

न कागजात चाहिए न पेपर वेट चाहिए
मेरी खाली प्लेट है ऑमलेट चाहिए |

न कोई लिफ्ट चाहिए न कोई सीढ़ी चाहिए
सस्ता जिगर है मेरा , मुझे बीड़ी चाहिए |

न विस्की चाहिए न शरबत चाहिए
मेरा मिट्टी का घर है, छत चाहिए |

अमरीका चला अपना राठोड़ |

पूरे ‪#‎HSS‬ डिपार्टमेंट की फरमाइश पे ये गजल पेश कर रहा हूँ , Kunal Rathod बधाई ( with same spirit Congratulations to Yashovardhan Jallan too, though its tough to pull out poetry from word Jallanfrown emoticon )
‪#‎USAonceAgain‬‪#‎SanFrancisco‬‪#‎Economics‬

पूरे डिपार्टमेंट का सिरमौर
हमारा अपना लौंडा राठोड़ |

गली गली में है यही सोर ( अरे ! सोर नहीं बाबा शोर )
गली गली में है यही शोर
अमरीका चला अपना राठोड़ |

CFA FRM को पीछे छोड़
अमरीका चला अपना राठोड़ |

अट्ठी नेहली को झकझोर
अमरीका चला अपना राठोड़ |

एक तरफ हम सवा सौ करोड़
एक तरफ अकेला राठोड़ |

जो कर नहीं पाया कोई और
कर गया अपना राठोड़ |

मुझे प्रतिरोध नहीं है तुमसे

मुझे प्रतिरोध नहीं है
तुमसे
मुझे डर है
तुम्हारी मासूमियत से; तुम जो हर बात पे सवाल करते हो
कमाल करते हो ;
लेकिन
तुम्हें नहीं मालुम
ये सर तुम्हारा है
ये भुजाएं तुम्हारी हैं
ये आँखें ये काजल
ये जटाएं तुम्हारी हैं
किन्तु इसके आर में
कोई और तुम्हारी जमीं पे
नया सिरा तलाश रहा हैं |
ये बागीचा, ये मिट्टी, ये खुरपी तुम्हारी हैं
बस बीज उसका हैं | तुम सवाल करो
कमाल करो
जंतर मंतर पर बवाल करो
बस इतना ख़याल करो
केसरिया को केसरिया रहने दो
इसे मत लाल करो
हरा को इतना गहरा मत कर दो
की जंगल हो जाए
जंगलों में सवाल करने की इजाजत नहीं होती |

इश्क़ में शहर होइए, शहीद मत होइए

अगर आपने आस पास के हम उम्रों को गौर से देखा होगा, तो समझा होगा की इश्क़ और प्यार की बातें वो लोग कभी नहीं करते जो इश्क़ में होते हैं, तब तक तो नहीं ही करते जब तक इश्क़ में होते हैं | क्यूंकि जब आप इश्क़ में होते हैं तब ये बस एक जीने का जरिया होता है , एक व्यस्त रहने मात्र की कारीगरी होती है और अगर इश्क़ में डूबते हैं तो ये आपकी ख़ुशी हंसी और जिंदगी होती है | लेकिन इश्क़ प्रदर्शन के कहीं ज्यादा दर्शन का विषय है | ये आपको तब समझ में आता है , जब आप इश्क़ में टूटते हैं, बिखरते हैं और एक बार फिर से तनहा होते हैं | हमारी अभिव्यक्ति और प्रदर्शन के बीच की रस्साकस्सी से जन्म लेती है ये एक तन्हाई |  तन्हाई चिरंतन है और एक निर्भीक सत्य है , शायद इसीलिए ये आपको इश्क़ जैसे नामचीन लफ्ज़ को समझने की हिम्मत देता है |

इश्क़ एक बार करिये जरूर, कुछ भी है बुरी चीज़ नहीं है | पूरी जिंदगी शतरंज का खेल खेलते खेलते हम इस  एहसास में खो जाते हैं की वो जो हमारा शत्रु है , कहीं बाहर है , हम सफ़ेद  मोहरे हैं तो वो स्याह मोहरा है , हम स्याह मोहरे हैं तो वो सफ़ेद मोहरा है | इश्क़ हमें एहसास दिलाता है की हमारे चलचित्र का विलन हमा…

Two Nazms and sleepless nights

वो जो कुछ तस्वीरें
हमने साथ साथ खींची थी
इस उम्मीद से की
एक दिन इसे पब्लिक करेंगे;
अब इन तस्वीरों से गुनाह की बू आती है |
तुम जो मुझे
मासूम समझते हो जाना
तुमने देखा नहीं है
 मुझे क़त्ल करते हुए |

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नींद आती है
करवटें बदलती हैं
कुछ कुछ नींद जैसी ही आती है
नींद नहीं आती |
चलती रहती हो तुम
आँखों के तले
किसी सिनेमा के रील की तरह |

कैसे कहते हैं वो एक कहानी

कैसे कहते हैं वो एक कहानी
जिसमें बयां हो जाए सब कुछ
दर्ज हो जाए एक एक किस्से
एहसास हो जाए
सही गलत का
हीरो विलन का
कैसे कहते हैं वो  एक कहानी
जो मैं सब कुछ कह दूँ
जो तुम कुछ भी ना समझो
या  फिर
तुम समझो ,
सिर्फ तुम समझो
इतना ही समझो
की खुद को समझा सको
इतना ना समझो
की मेरी कहानी
सरे आम बाजार में लुट जाए |
कैसे कहते हैं वो एक कहानी ?

Never try to be God.

Never try to be God. Its easy actually to be god, to come out for a rescue. But the point is once you become or take the oath of being god, you can't get back to being human. God is a strict phenomena, no mistakes, no expectations, purity . It's too utopian to survive in this society being god. Trying to be god is trying to love someone out of empathy, trying connect out of someone's pain and grimness. While being human gives you right to expect something, right of cherish something and also right to reject something. Being human means you can expect your parents to be a bit less strict, you can expect your girlfriends to be running out and burning calories and everything that gives you a smile of achievement you can expect.
Being god is not gonna provide you any. Be human, learn to tackle your issues and worries first, learn to understand yourself first and then start sharing yourself to others. Remember nobody wants you to be empathetic, empathy is just a beginning to t…

लिबरल सी अर्थ व्यवस्था

जब इस समंदर में
तुम अकेली लुटेरी थी
तब की बात और थी
बस तुम ही एक सुनहरी थी |
तब की बात और थी 
बिना किसी रोक टोक के
व्हाट्सप्प के चैट में
तुम सबसे अव्वल आती थी |
बंद बंद सी अर्थ व्यवस्था थी तब,
बंद बंद दरवाजे थे ;
तुम रोती थी, गाती थी
बस तुम्हारी आवाजें थी ;
किसी को आने की इजाजत ना थी तुम्हारे सिवा
तब की बात और थी | अब थोड़ी लिबरल सी अर्थ व्यवस्था है
दरवाजे खुले हैं अब
कोई भी ट्रूली मैडली , टिंडर सा
आता जाता रहता है तुम्हारे सिवा ||

हम जब भी रोते हैं , शहर डूब जाता है

परिंदों का हम सा कोई खानदान नहीं रहता
परिंदे बंटवारे पे उतर आते तो आसमान नहीं रहता ||

मैंने जिस नज़रिये से देखा था खबर
अखबार में ऐसा कोई बयान नहीं रहता ||

वो जो रहते हैं, अँधेरे में चराग की तरह
शहर में उनका देर तक निशान नहीं रहता ||

जिस अरमा से पैदा हुए, खेले कूदे बड़े हुए
उम्र आने तलक कोई अरमान नहीं रहता ||

जिससे जुबानी मिली, दिलों में उतर आये
मेरे घरौंदे में कोई  मेहमान नहीं रहता ||

वो जिसकी आरजू में , तेरी आरजू है जानां
बाज़ार में ऐसा कोई सामान नहीं रहता ||

हम जब भी रोते  हैं , शहर डूब जाता है
हमारे जख्मों से कोई अनजान नहीं रहता ||

A doctor and A poet

When I was down with cold and fever
She came up
with precautions and pills:
'What keeps us alive and what kills'.

When she was broken, shattered
lull abominably ,
I read her
Tennyson and Shelley :
"If winter comes, can Spring be far behind ?"
and again and again
"If winter comes, can Spring be far behind ?"

She is a doctor
I am a poet.
She cures everything,
everything and everything.
I cure anything
that she can't.

But one day
When a little prince
came to her first and then me
for a simple investigation
of his life and agony
"If Its love or not ? "

She did all tests, yet denied to comment.
I read all literature yet denied to conclude .

God !
What can be the valour of that pain,
Doctors can't treat, Poets can't sweeten.

वजूद

मैंने
जिंदगी के कतरे कतरे को
मुठ्ठी भर तम्बाकू की तरह
संभाला है , छाना है
जरुरत अनुसार
तुम्हारे अश्क का दीदार किया है ,
तुम्हारे लम्स की खुसबू मिलायी है
और
फिर बड़ी संजीदगी से
सफ़ेद लिबास में संजोया है |

तूने  एक माचिस जला कर
मेरे वजूद को नेस्तनाबूद कर दी
अब मैं तुझमें उतर गया हूँ
फ़क़त  धुंआ सा रह गया हूँ ||