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Showing posts from February, 2016

अमरीका चला अपना राठोड़ |

पूरे ‪#‎HSS‬ डिपार्टमेंट की फरमाइश पे ये गजल पेश कर रहा हूँ , Kunal Rathod बधाई ( with same spirit Congratulations to Yashovardhan Jallan too, though its tough to pull out poetry from word Jallanfrown emoticon )
‪#‎USAonceAgain‬‪#‎SanFrancisco‬‪#‎Economics‬

पूरे डिपार्टमेंट का सिरमौर
हमारा अपना लौंडा राठोड़ |

गली गली में है यही सोर ( अरे ! सोर नहीं बाबा शोर )
गली गली में है यही शोर
अमरीका चला अपना राठोड़ |

CFA FRM को पीछे छोड़
अमरीका चला अपना राठोड़ |

अट्ठी नेहली को झकझोर
अमरीका चला अपना राठोड़ |

एक तरफ हम सवा सौ करोड़
एक तरफ अकेला राठोड़ |

जो कर नहीं पाया कोई और
कर गया अपना राठोड़ |

मुझे प्रतिरोध नहीं है तुमसे

मुझे प्रतिरोध नहीं है
तुमसे
मुझे डर है
तुम्हारी मासूमियत से; तुम जो हर बात पे सवाल करते हो
कमाल करते हो ;
लेकिन
तुम्हें नहीं मालुम
ये सर तुम्हारा है
ये भुजाएं तुम्हारी हैं
ये आँखें ये काजल
ये जटाएं तुम्हारी हैं
किन्तु इसके आर में
कोई और तुम्हारी जमीं पे
नया सिरा तलाश रहा हैं |
ये बागीचा, ये मिट्टी, ये खुरपी तुम्हारी हैं
बस बीज उसका हैं | तुम सवाल करो
कमाल करो
जंतर मंतर पर बवाल करो
बस इतना ख़याल करो
केसरिया को केसरिया रहने दो
इसे मत लाल करो
हरा को इतना गहरा मत कर दो
की जंगल हो जाए
जंगलों में सवाल करने की इजाजत नहीं होती |

इश्क़ में शहर होइए, शहीद मत होइए

अगर आपने आस पास के हम उम्रों को गौर से देखा होगा, तो समझा होगा की इश्क़ और प्यार की बातें वो लोग कभी नहीं करते जो इश्क़ में होते हैं, तब तक तो नहीं ही करते जब तक इश्क़ में होते हैं | क्यूंकि जब आप इश्क़ में होते हैं तब ये बस एक जीने का जरिया होता है , एक व्यस्त रहने मात्र की कारीगरी होती है और अगर इश्क़ में डूबते हैं तो ये आपकी ख़ुशी हंसी और जिंदगी होती है | लेकिन इश्क़ प्रदर्शन के कहीं ज्यादा दर्शन का विषय है | ये आपको तब समझ में आता है , जब आप इश्क़ में टूटते हैं, बिखरते हैं और एक बार फिर से तनहा होते हैं | हमारी अभिव्यक्ति और प्रदर्शन के बीच की रस्साकस्सी से जन्म लेती है ये एक तन्हाई |  तन्हाई चिरंतन है और एक निर्भीक सत्य है , शायद इसीलिए ये आपको इश्क़ जैसे नामचीन लफ्ज़ को समझने की हिम्मत देता है |

इश्क़ एक बार करिये जरूर, कुछ भी है बुरी चीज़ नहीं है | पूरी जिंदगी शतरंज का खेल खेलते खेलते हम इस  एहसास में खो जाते हैं की वो जो हमारा शत्रु है , कहीं बाहर है , हम सफ़ेद  मोहरे हैं तो वो स्याह मोहरा है , हम स्याह मोहरे हैं तो वो सफ़ेद मोहरा है | इश्क़ हमें एहसास दिलाता है की हमारे चलचित्र का विलन हमा…

Two Nazms and sleepless nights

वो जो कुछ तस्वीरें
हमने साथ साथ खींची थी
इस उम्मीद से की
एक दिन इसे पब्लिक करेंगे;
अब इन तस्वीरों से गुनाह की बू आती है |
तुम जो मुझे
मासूम समझते हो जाना
तुमने देखा नहीं है
 मुझे क़त्ल करते हुए |

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नींद आती है
करवटें बदलती हैं
कुछ कुछ नींद जैसी ही आती है
नींद नहीं आती |
चलती रहती हो तुम
आँखों के तले
किसी सिनेमा के रील की तरह |

कैसे कहते हैं वो एक कहानी

कैसे कहते हैं वो एक कहानी
जिसमें बयां हो जाए सब कुछ
दर्ज हो जाए एक एक किस्से
एहसास हो जाए
सही गलत का
हीरो विलन का
कैसे कहते हैं वो  एक कहानी
जो मैं सब कुछ कह दूँ
जो तुम कुछ भी ना समझो
या  फिर
तुम समझो ,
सिर्फ तुम समझो
इतना ही समझो
की खुद को समझा सको
इतना ना समझो
की मेरी कहानी
सरे आम बाजार में लुट जाए |
कैसे कहते हैं वो एक कहानी ?

Never try to be God.

Never try to be God. Its easy actually to be god, to come out for a rescue. But the point is once you become or take the oath of being god, you can't get back to being human. God is a strict phenomena, no mistakes, no expectations, purity . It's too utopian to survive in this society being god. Trying to be god is trying to love someone out of empathy, trying connect out of someone's pain and grimness. While being human gives you right to expect something, right of cherish something and also right to reject something. Being human means you can expect your parents to be a bit less strict, you can expect your girlfriends to be running out and burning calories and everything that gives you a smile of achievement you can expect.
Being god is not gonna provide you any. Be human, learn to tackle your issues and worries first, learn to understand yourself first and then start sharing yourself to others. Remember nobody wants you to be empathetic, empathy is just a beginning to t…

लिबरल सी अर्थ व्यवस्था

जब इस समंदर में
तुम अकेली लुटेरी थी
तब की बात और थी
बस तुम ही एक सुनहरी थी |
तब की बात और थी 
बिना किसी रोक टोक के
व्हाट्सप्प के चैट में
तुम सबसे अव्वल आती थी |
बंद बंद सी अर्थ व्यवस्था थी तब,
बंद बंद दरवाजे थे ;
तुम रोती थी, गाती थी
बस तुम्हारी आवाजें थी ;
किसी को आने की इजाजत ना थी तुम्हारे सिवा
तब की बात और थी | अब थोड़ी लिबरल सी अर्थ व्यवस्था है
दरवाजे खुले हैं अब
कोई भी ट्रूली मैडली , टिंडर सा
आता जाता रहता है तुम्हारे सिवा ||