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Showing posts from April, 2016

रेल और पुल

तू किसी रेल सी गुजरती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ | _____ दुष्यंत कुमार |

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जब ट्रेन आती है , तुम्हारी याद आती है;
एक स्क्रीच वाली ध्वनि के साथ
तुम्हारी याद आती है |
तुम दुष्यंत कुमार की गजल जैसी हो
रेल सी गुजरती हो
मैं विद्रोही का पत्थर
देवता जैसा नज़र आता हूँ
देवता नहीं हूँ |
एक टूटे हुए पुल का अवशेष मात्र हूँ
जिसे किसी ने  ठोकर मार कर
सड़क किनारे पहुँचा दिया
और फिर किसी ने
फूल बाँध कर टीका चढ़ा दिया |


मैं भी दुष्यंत कुमार की गजल जैसा हुआ करता था |
तुम रेल सी गुजरती थी
मैं पुल सा थरथराता था
तुम गुजरती थी, मैं थरथराता था
तुम गुजरत थी, मैं थरथराता था |
और अब मैं टूट के गिर गया हूँ
"ममता" के फ्लाईओवर की तरह बिखर गया हूँ |
लेकिन तुम रेल हो
तुम गुजरती रहना
नये  पुल का  तलाश करना
और गुजरती रहना |
क्यूंकि तुम जिंदगी को जोड़ती हो
क्यूंकि तुम लम्हों को खुबसूरत बनाती  हो
क्यूंकि तुम हर यायावर के सफ़र की साथी हो |

मैं भी कोशिश करूँगा
की इस बार
पढ़े लिखे अभियंताओं के हाथ लगूं |
पत्थर से पुल बनूँ
और तुम रेल सी गुजरो कभी…

खूबसूरत

कितना खूबसूरत होता -
हमारे तुम्हारे बीच जो एक
दीवार बन गयी है
उसमें एक खिड़की भी बन जाती |
कभी हम खोल लिया करते
और देखते तुम सुकून से सो रही हो;
कभी तुम खोल लिया करती
और देखती मैं सुकून से सिगरेट जला रहा हूँ ||

तुम्हारे और हमारे बीच
एक इश्क का रिश्ता होना
सबसे खूबसूरत नहीं होता |
सबसे खूबसूरत होता है
कुछ नहीं होना
और फिर भी इतना कुछ का हो जाना |
सबसे खूबसूरत होता है
टूटे रिश्ते में भी
एक दूसरे का ख्याल आना |

सबसे खूबसूरत लम्हें तस्वीरों में नहीं आते;
इन्स्टा ग्राम की वो सारी पिक्चरें
सबसे खूबसूरत नहीं होती ;
सबसे खूबसूरत होता है
वीरान सड़क पे
धुप्प अँधेरे में
एक थके हुए दोस्त का
आपके कंधे पे सो जाना |

वो एक लम्हा
जिसमें पल रहा है
आपके दर्द के सहारे किसी का सुकून ;
सबसे खूबसूरत होता है
वो एक लम्हा
जिसे कोई मेगापिक्सल कैद नहीं कर सकता |