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शूल

जब तुम मेरे पास होते हो
तुम मेरे पास नहीं होते |
तुम मेरे पास तभी होते हो
जब तुम मेरे पास नहीं होते |
तुम्हारा होना,
मेरे इस सफ़ेद दीवार से चेहरे पे
बस एक मुस्कराहट का होना है |
लेकिन तुम्हारा ना होना
एक शूल की तरह चुभता है
मेरे सीने जेहन में
लम्हा लम्हा घड़ी घड़ी |

मैं बन गया हूँ
एक उदासीन निर्मम जमीं
जो एहसास करता है
अपने बदन के खुश्बू की रौनक
तुम्हारे आसमान के आंसू में भींग कर |
कहीं ऐसा तो नहीं ?

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मौत कोई कविता नहीं है |

पिछले एक महीने में आई आई टी  खड़गपुर से दो छात्रों के सुसाइड की खबर, खबर से कहीं  ज्यादा उस एक सत्य की तलाश भी है जिसे हम आपने अर्सों से झुठला रखा है | लेकिन हर बार घूम फिर के सारा दोष संस्थान पे फेक देना भी उतना ठीक नहीं है | कभी कभी ये भी जरुरी है की हम अपना आत्मविश्लेषण करें - आखिर क्या कमी रह गयी जो हम एक लम्हे भर के आक्रोश को रोक नहीं पाए | एक छात्र का निर्माण घर से शुरू होता है, कॉलोनी वाले , आस पड़ोस वाले उसके इंस्पिरेशन बनते हैं और कहीं न कहीं सफलता की परिभाषा भी उसी दौड़ में गढ़ी जाती है | स्कूल आपका स्तम्भ है, कॉलेज उसपे पताका बांधता है | ऐसे में हर बात पे आई आई टी को सारा दोष देना भी तो ठीक नहीं | एक छात्र की हार में जितना जिम्मेदार कॉलेज है उतना ही उसका पिता भी, उसका परिवार भी, उसका समाज भी, उसका स्कूल भी | क्योंकि इनसब ने मिलकर तय किया था सफल होना , बुलंदियों को छूना, और जीतना का एक फ़र्ज़ी डेफिनिशन |

मौत कोई कविता नहीं है | 

वो इस सदी का सबसे बेवक़ूफ़ शायर है
जिसने कह रखा है
"मौत तू एक कविता है |"
मौत कोई कविता नहीं है
कविता है - मौत के खिलाफ विद्रोह |
वो शायर मेरा हर …

पता ही ना चला |

मैं चाहता था मैं बनूँ
सामानांतर सी  रेखा, साथ साथ चलती पटरी  |
मैं कब गुजर बैठ तुमसे
तुम कब गुजर बैठी हमसे
और फिर निकल गए बड़ी दूर,
पारस्परिक रेखाओं की तरह
पता ही ना चला |

मैं चाहता था मैं बनूँ
एक हसीन ख्वाब;
तुम्हारे उधड़े दिनों में
काम आये जिनकी यादें |
मैं कब बन गया
आधी रात का वो एक स्वप्न
और निगल बैठ तुम्हारी नींद
पता ही न चला |

मैं चाहता था
मैं बनूँ हवा का झोंका
जो उड़ाए तुम्हारी जुल्फों को बेपनाह
जिसके ठीक पीछे नज़र आये
स्याह रात में चमकते आकांक्षाओं के साइनबोर्ड |
मैं कब बन गया तूफ़ान
और झकझोर बैठा तुम्हारी छाती
रौंद दिए अपने पैरों के तले तुम्हारे आँसू
पता ही ना चला |

AMRITA PRITAM :A Diary Entry

"There was a grief I smoked
in silence, like a cigarette
only a few poems fell
out of the ash I flicked from it."
:Amrita pritam

The afternoon of october 31,2005, literature sensed the demise of an embodiment that was capturing the intensity of social dilemma, emotions of feminism and precisely the perpetual state of love making since time immemorial.

Those days I started nourishing my keen interest in hindi literature through translated works of this lady.  To be more qualitative behind the every craftsmanship that I started edging out with time , behind the reflection that my lines managed out of emotional and relational dictum there lies some inspiration .

Writings of Amrita Pritam were not like advises rather a demand redefining the norms and the social structure.
Today I erased my house number;
gifted the street plate
 to the long grown darkness.
And identity that defines
the road to my street
I immersed that to tidal waves.
Yet I have an answer
to your desperation to meet …