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दीवार

हमारे तुम्हारे बीच
कोई दीवार बनी नहीं थी |
खिड़कियां थी, शीशे की
खुलती बंद होती लापरवाह दोस्त की तरह |

फिर एक दिन अचानक
डूबती शाम के इस पार
खड़े थे हम
और उस पार तुम -
दीवार बना दी हमने |

दीवार खड़ी हो गयी,
लेकिन हम जीते रहे उसी दौर में
जब कोई दीवार थी ही नहीं -
फिर रोज़ रोज़ की बहस में
दीवार बिखड़ कर गिर गयी |

दीवार बिखड़ कर गिर गयी
लेकिन हम जीते रहे उस दौर में
जब एक दीवार खड़ी थी
हमारे तुम्हारे दरमियान |
फिर रोज़ रोज़ की ख़ामोशी
रोज़ रोज़ के सन्नाटे
रोज़ रोज़ की बहस की आग में तप रही
जमीं की मिट्टी
सुर्ख लाल हो गयी है -
ईंटें तैयार हैं
नयी दीवार उठाने को |

बनते बिगड़ते दीवारों सी
रह गयी है जिंदगी |
काश बस खिड़कियां होती, शीशे की
खुलती बंद होती लापरवाह दोस्त की तरह | 

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मौत कोई कविता नहीं है |

पिछले एक महीने में आई आई टी  खड़गपुर से दो छात्रों के सुसाइड की खबर, खबर से कहीं  ज्यादा उस एक सत्य की तलाश भी है जिसे हम आपने अर्सों से झुठला रखा है | लेकिन हर बार घूम फिर के सारा दोष संस्थान पे फेक देना भी उतना ठीक नहीं है | कभी कभी ये भी जरुरी है की हम अपना आत्मविश्लेषण करें - आखिर क्या कमी रह गयी जो हम एक लम्हे भर के आक्रोश को रोक नहीं पाए | एक छात्र का निर्माण घर से शुरू होता है, कॉलोनी वाले , आस पड़ोस वाले उसके इंस्पिरेशन बनते हैं और कहीं न कहीं सफलता की परिभाषा भी उसी दौड़ में गढ़ी जाती है | स्कूल आपका स्तम्भ है, कॉलेज उसपे पताका बांधता है | ऐसे में हर बात पे आई आई टी को सारा दोष देना भी तो ठीक नहीं | एक छात्र की हार में जितना जिम्मेदार कॉलेज है उतना ही उसका पिता भी, उसका परिवार भी, उसका समाज भी, उसका स्कूल भी | क्योंकि इनसब ने मिलकर तय किया था सफल होना , बुलंदियों को छूना, और जीतना का एक फ़र्ज़ी डेफिनिशन |

मौत कोई कविता नहीं है | 

वो इस सदी का सबसे बेवक़ूफ़ शायर है
जिसने कह रखा है
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मौत कोई कविता नहीं है
कविता है - मौत के खिलाफ विद्रोह |
वो शायर मेरा हर …

इतिहास*

'तुम खूबसूरत हो' ये मैं तुम्हें तब तब कहूँगा जब जब मेरा दिल करेगा । 'तुम खूबसूरत हो' मैं ये तुम्हें तब भी कहूँगा जब जब तुम्हें जरुरत होगी । जब बिन मौसम बरसात होगी मैं कहूँगा 'तुम खूबसूरत हो ।' जब शायरी की बात होगी मैं कहूँगा 'तुम खूबसूरत हो ।' जब तुम्हारे चेहरे पे धूप आएगी मैं कहूँगा 'तुम खूबसूरत हो ।' जब चलते चलते रुक जाओगी चेहरे कुम्हला जाएँगे मैं कहूँगा 'तुम खूबसूरत हो ।' तब जबकि शाम होगी बत्तियां आधी बुझी होगी मैं कहूँगा 'तुम खूबसूरत हो ।' तब जबकि रात होगी सितारों की बारात होगी मैं कहूँगा 'तुम खूबसूरत हो ।' तुम सुनते सुनते ऊब जाओगी लेकिन मैं कहता रहूँगा 'तुम खूबसूरत हो ।'
मुझे नहीं मालुम तुम कितनी सच हो कितनी परिकल्पना | मुझे नहीं मालुम तुममें कितना जमीन है और कितना आसमां । मुझे नहीं मालुम तुम हो कहाँ और मैं हूँ कहाँ | मुझे बस इतना मालुम है की तुम खूबसूरत हो और इस बात को इतिहास में दर्ज करना मेरी जिम्मेदारी है ।। *नज़्म साराह के की पोएट्री " व्हेन लव अराइवेस "…

पता ही ना चला |

मैं चाहता था मैं बनूँ
सामानांतर सी  रेखा, साथ साथ चलती पटरी  |
मैं कब गुजर बैठ तुमसे
तुम कब गुजर बैठी हमसे
और फिर निकल गए बड़ी दूर,
पारस्परिक रेखाओं की तरह
पता ही ना चला |

मैं चाहता था मैं बनूँ
एक हसीन ख्वाब;
तुम्हारे उधड़े दिनों में
काम आये जिनकी यादें |
मैं कब बन गया
आधी रात का वो एक स्वप्न
और निगल बैठ तुम्हारी नींद
पता ही न चला |

मैं चाहता था
मैं बनूँ हवा का झोंका
जो उड़ाए तुम्हारी जुल्फों को बेपनाह
जिसके ठीक पीछे नज़र आये
स्याह रात में चमकते आकांक्षाओं के साइनबोर्ड |
मैं कब बन गया तूफ़ान
और झकझोर बैठा तुम्हारी छाती
रौंद दिए अपने पैरों के तले तुम्हारे आँसू
पता ही ना चला |